स्वतंत्रता दिवस पर मुझे अपनी कविता याद आई- 'हरश्रृंगार के फूल '। इसे मैंने जून -२००४ में लिखी थी। हरश्रृंगार के फूल शरद ऋतु में रात में खिलते हैं और सुबह जमीन पर गिर जाते हैं। कविता इस प्रकार है :
शरद ऋतु की शीतल उषा
बिस्तर छोड़ना जब लगती है सजा
अधखुले नैन बंद हो जाते हैं स्वतः
जब सोचा हो ७ पर बज रहा हो ६
सोता देख माँ ने उठाया, कहा
आज सैर पर नहीं जाओगे क्या ?
बिस्तर छोड़ अनमना सा मैं उठा
चौखट पर पहुँचा ज्यों चलने को हुआ
पथ पर पड़े हरश्रिंगर के फूलों ने मुझे देखा
छोटे, सफ़ेद पुष्पों ने मुस्काया, कहा
आज इतनी देर क्यूँ कर दी सखा ?
कल ईश्वर के चरणों में हमने तजे थे प्राण
फिर आज पैरों तले कुचलवाया क्यूँ भला ?
फूलों की दशा ने मुझे व्यथित कर दिया
क्या खुद के लिए जीने को मानव जीवन है मिला ?
ईश्वर ने हमे बनाया और शक्तिया दी विशेष
तो सोचा होगा हम दूर करेंगे सबके क्लेश
खुली आँखें, हुआ अपने कर्तव्य का ज्ञान
शरद ऋतु में पुष्पों का देखा जब मूक बलिदान
~~ सौरभ (अर्थात फूलों की सुगंध )
शरद ऋतु की शीतल उषा
बिस्तर छोड़ना जब लगती है सजा
अधखुले नैन बंद हो जाते हैं स्वतः
जब सोचा हो ७ पर बज रहा हो ६
सोता देख माँ ने उठाया, कहा
आज सैर पर नहीं जाओगे क्या ?
बिस्तर छोड़ अनमना सा मैं उठा
चौखट पर पहुँचा ज्यों चलने को हुआ
पथ पर पड़े हरश्रिंगर के फूलों ने मुझे देखा
छोटे, सफ़ेद पुष्पों ने मुस्काया, कहा
आज इतनी देर क्यूँ कर दी सखा ?
कल ईश्वर के चरणों में हमने तजे थे प्राण
फिर आज पैरों तले कुचलवाया क्यूँ भला ?
फूलों की दशा ने मुझे व्यथित कर दिया
क्या खुद के लिए जीने को मानव जीवन है मिला ?
ईश्वर ने हमे बनाया और शक्तिया दी विशेष
तो सोचा होगा हम दूर करेंगे सबके क्लेश
खुली आँखें, हुआ अपने कर्तव्य का ज्ञान
शरद ऋतु में पुष्पों का देखा जब मूक बलिदान
~~ सौरभ (अर्थात फूलों की सुगंध )