Thursday, 15 August 2013

कवि मन- हरश्रृंगार के फूल

स्वतंत्रता दिवस पर मुझे अपनी कविता याद आई- 'हरश्रृंगार के फूल '।  इसे मैंने जून -२००४ में लिखी थी। हरश्रृंगार के फूल शरद ऋतु में रात में खिलते हैं और सुबह जमीन पर गिर जाते हैं। कविता इस प्रकार है :

शरद ऋतु की शीतल उषा
बिस्तर छोड़ना जब लगती है सजा
अधखुले नैन बंद हो जाते हैं स्वतः
जब सोचा हो ७ पर बज रहा हो ६
सोता  देख माँ ने उठाया, कहा
आज सैर पर नहीं जाओगे क्या ?
बिस्तर छोड़ अनमना सा मैं उठा
चौखट पर पहुँचा ज्यों चलने को हुआ
पथ पर पड़े हरश्रिंगर के फूलों ने मुझे देखा
छोटे, सफ़ेद पुष्पों ने मुस्काया, कहा
आज इतनी देर क्यूँ कर दी सखा ?
कल ईश्वर के चरणों में हमने तजे थे प्राण
फिर आज पैरों तले कुचलवाया क्यूँ भला ?
फूलों की दशा ने मुझे व्यथित कर दिया
क्या खुद के लिए जीने को मानव जीवन है मिला ?
ईश्वर ने हमे बनाया और शक्तिया दी विशेष
तो सोचा होगा हम दूर करेंगे सबके क्लेश
खुली आँखें, हुआ अपने कर्तव्य का ज्ञान
शरद ऋतु में पुष्पों का देखा जब मूक बलिदान

~~  सौरभ (अर्थात फूलों की सुगंध )

Wednesday, 14 August 2013

रेल गाथा - पूरण ड्राईवर

नाम का एक दौर चलता है।  ८० के दशक में पैदा हुआ हर तीसरा लड़का 'अमित' या 'सौरभ' होता था । ५० के दशक में शायद बुंदेलखंड में 'पूरण' नाम प्रचलित होगा।  हमारे दफ्तर में भी पूरण नाम के कुछ कर्मचारी हैं।  उन्ही में से एक है हमारा ड्राईवर - पूरण।
दफ्तर की घडी में  दो बज गए थे। सभी कर्मचारियों के टिफिन खुल गए थे। हम अपने साथी अफसर के साथ बैठे ड्राईवर पूरण  का इंतजार कर रहे थे जिसकी ड्यूटी २ बजे शुरू होती है । १ किमी  दूर स्टैंड से गाड़ी लेकर वह  रोज २ बजे दफ्तर आ जाता है। देर होता देख साथी अफसर ने उसे फ़ोन लगाया - "पूरण तुरंत  ऑफिस आओ "।

हम दोनों दफ्तर के बाहर आकर खड़े हो गए।  १० मिनट बाद सामने पूरण पैदल  आता हुआ दिखाई  दिया। पैदल आता देख कर हम अचरज में रह गए - गाड़ी कहीं ख़राब तो नहीं हो गयी। सवेरे तो ठीक थी।
मैंने  चिल्ला कर पूछा - "पूरण, गाड़ी कहाँ है ?"
पूरण - " साब ने तो कहा की तुरंत ऑफिस आओ। इसलिए मैं चला आया। गाडी लाऊं साब ?"

हम दोनों का गुस्सा ठहाके में बदल गया। पूरण के साथ पैदल स्टैंड की तरफ चलते हुए मुझे फिर '' barriers  of communication" याद आया।

Tuesday, 13 August 2013

घरेलू हादसे - सब्जी की खोज


भूमिका  वाला पैरा  छोड़ कर , सीधे  मुददे  पर आता हूँ। घरेलु जिंदगी में घटने वाले हास्य को संकलित करने की कोशिश की है।
हमारी  दिनचर्या की शुरुआत प्रात: बाई की घंटी से होती है। उस दिन सवेरे मैडम ने परवल की सब्जी बनाई,जिसे मैं दोपहर में खाता हूँ । बाई भी अपना काम ख़तम कर के घर जाने को हुई। मैडम ने कहा "सपना  फ्रिज में रखी  रात की सब्जी व दाल घर लेती जाना"। सपना के लिए यह एक ईनाम से कम नहीं होता। उसने पन्नी में सब्जी व दाल बंधी और घर चली गयी। नाश्ते में हमने  रोज़ की तरह दलिया और अंकुरित चने खाए और मैडम के साथ ऑफिस के लिए निकल गए।
 दोपहर में मैं खाना - खाने  घर आया। रोज़ की तरह बाई ने टेबल पर खाने की प्लेट रख दी और किचन में काम करने लगी।  मैंने थाली देखी  - दाल,चावल और रोटी।  सब्जी नदारत थी।
 मैंने बाई से कहा - "सब्जी  कहाँ है ?"
बाई - " साहब, आज तो सब्जी नहीं है। "
मैं - "नहीं है मतलब ?(गुस्से में  ) ठीक से देखो फ्रीज़ में रखी होगी। "
बाई -"साहब, आज तो मैडम सब्जी बनाने को नहीं  बोलीं । "
मैं - " मैं अभी आता हूँ,और तुम्हे दिखता हूँ ,कहाँ रखी है।तुम्हे  तो कुछ दिखता ही नहीं। "जा कर देखा तो सब्जी फ्रिज में नहीं मिली।मैडम को फोन लगाया तो बोलीं -सब्जी फ्रिज में ही है।
मामला ब्योमकेश बक्षी के एपिसोड जैसा जटिल होता जा रहा था। मुझे बाई को मिला इनाम याद आया।
मैं - " तुम सवेरे घर क्या लेकर गयी थी? "
बाई - " मैं सवेरे दाल और वो वो.. २-३ तरह की सब्जी ले गयी थी। "
मैं - " हम्म सब्जी में क्या था ?"
बाई - "साब परवल था "
मैंने हँसते हुए अपना खाना  शांतिपूर्वक ख़तम किया। बाई ने सिल पर चटनी पीस दी थी।  मेरी सब्जी वो  सवेरे के नाश्ते में चट कर चुकी  थी। घटना मुझे '' barriers of  communication " वाली क्लास की याद दिला रही थी।