Wednesday, 14 August 2013

रेल गाथा - पूरण ड्राईवर

नाम का एक दौर चलता है।  ८० के दशक में पैदा हुआ हर तीसरा लड़का 'अमित' या 'सौरभ' होता था । ५० के दशक में शायद बुंदेलखंड में 'पूरण' नाम प्रचलित होगा।  हमारे दफ्तर में भी पूरण नाम के कुछ कर्मचारी हैं।  उन्ही में से एक है हमारा ड्राईवर - पूरण।
दफ्तर की घडी में  दो बज गए थे। सभी कर्मचारियों के टिफिन खुल गए थे। हम अपने साथी अफसर के साथ बैठे ड्राईवर पूरण  का इंतजार कर रहे थे जिसकी ड्यूटी २ बजे शुरू होती है । १ किमी  दूर स्टैंड से गाड़ी लेकर वह  रोज २ बजे दफ्तर आ जाता है। देर होता देख साथी अफसर ने उसे फ़ोन लगाया - "पूरण तुरंत  ऑफिस आओ "।

हम दोनों दफ्तर के बाहर आकर खड़े हो गए।  १० मिनट बाद सामने पूरण पैदल  आता हुआ दिखाई  दिया। पैदल आता देख कर हम अचरज में रह गए - गाड़ी कहीं ख़राब तो नहीं हो गयी। सवेरे तो ठीक थी।
मैंने  चिल्ला कर पूछा - "पूरण, गाड़ी कहाँ है ?"
पूरण - " साब ने तो कहा की तुरंत ऑफिस आओ। इसलिए मैं चला आया। गाडी लाऊं साब ?"

हम दोनों का गुस्सा ठहाके में बदल गया। पूरण के साथ पैदल स्टैंड की तरफ चलते हुए मुझे फिर '' barriers  of communication" याद आया।

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