भूमिका वाला पैरा छोड़ कर , सीधे मुददे पर आता हूँ। घरेलु जिंदगी में घटने वाले हास्य को संकलित करने की कोशिश की है।
हमारी दिनचर्या की शुरुआत प्रात: बाई की घंटी से होती है। उस दिन सवेरे मैडम ने परवल की सब्जी बनाई,जिसे मैं दोपहर में खाता हूँ । बाई भी अपना काम ख़तम कर के घर जाने को हुई। मैडम ने कहा "सपना फ्रिज में रखी रात की सब्जी व दाल घर लेती जाना"। सपना के लिए यह एक ईनाम से कम नहीं होता। उसने पन्नी में सब्जी व दाल बंधी और घर चली गयी। नाश्ते में हमने रोज़ की तरह दलिया और अंकुरित चने खाए और मैडम के साथ ऑफिस के लिए निकल गए।
दोपहर में मैं खाना - खाने घर आया। रोज़ की तरह बाई ने टेबल पर खाने की प्लेट रख दी और किचन में काम करने लगी। मैंने थाली देखी - दाल,चावल और रोटी। सब्जी नदारत थी।
मैंने बाई से कहा - "सब्जी कहाँ है ?"
बाई - " साहब, आज तो सब्जी नहीं है। "
मैं - "नहीं है मतलब ?(गुस्से में ) ठीक से देखो फ्रीज़ में रखी होगी। "
बाई -"साहब, आज तो मैडम सब्जी बनाने को नहीं बोलीं । "
मैं - " मैं अभी आता हूँ,और तुम्हे दिखता हूँ ,कहाँ रखी है।तुम्हे तो कुछ दिखता ही नहीं। "जा कर देखा तो सब्जी फ्रिज में नहीं मिली।मैडम को फोन लगाया तो बोलीं -सब्जी फ्रिज में ही है।
मामला ब्योमकेश बक्षी के एपिसोड जैसा जटिल होता जा रहा था। मुझे बाई को मिला इनाम याद आया।
मैं - " तुम सवेरे घर क्या लेकर गयी थी? "
बाई - " मैं सवेरे दाल और वो वो.. २-३ तरह की सब्जी ले गयी थी। "
मैं - " हम्म सब्जी में क्या था ?"
बाई - "साब परवल था "
मैंने हँसते हुए अपना खाना शांतिपूर्वक ख़तम किया। बाई ने सिल पर चटनी पीस दी थी। मेरी सब्जी वो सवेरे के नाश्ते में चट कर चुकी थी। घटना मुझे '' barriers of communication " वाली क्लास की याद दिला रही थी।
:) Perfectly depicts your pain at losing 'Parval ki Sabzi'!! Nicely put..
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